एक डोली और एक अर्थी आपस में टकरा गए इन्हें देख लोग घबरा गये ऊपर से आवाज़ आई ये कैसी बिदाई है लोगो ने कहा महबूब की डोली देखने यार की अर्थी आई है
Wednesday, October 19, 2011
कुछ तुम कहो कुछ मैं कहु |: खूब चलता है ब्लॉग जगत में औरत और मर्द का भेद भाव
Tuesday, July 19, 2011
स्त्री-तžव
Thursday, March 24, 2011
राहतें और भी हैं
संतुष्टि का मंत्रोच्चारण और उसके प्रभाव-प्रकार अलग हैं लेकिन जब रसोई को महंगाई खाने लगे तब प्रेम के भावों पर अभाव हावी हो ही जाते हैं। सिर और पैरों की जंग में चादर अक्सर फटती आई है। शायर ने कहा भी है :
ढांपें हैं हमने पैर तो नंगे हुए हैं सिर
या पैर नंगे हो गए सिर ढांपते हुए। यह तो हुई अभावों की बात। अब इसके बावजूद अगर प्रेम को ही देखना है तो कहा जा सकता है कि प्रेम में जो लड़के होते हैं वे बहुत सीधे होते हैं और प्रेम में जो लड़कियां होती हैं वे भी चालाक नहीं होती। प्रेम की तासीर है कि चालाकों को बख्श देता है। जिन लड़कियों के नितांत निजी पल मोबाइल कैमरे झपट लेते हैं वे बहुत बाद में जानती हैं कि प्रेम दरअसल था ही नहीं। वही कुछ कमजोर पल सार्वजनिक हो जाते हैं और ऐसा सबकुछ लिख डालते हैं जो पढने योग्य नहीं होता।
प्रेम न तो बांधता है और न छोड़ता है। वह है तो है और नहीं है तो नहीं है। वह सबके प्रति एक सा होता है। देश, संबंध, प्रकृति, मानवता और उस सबकुछ के प्रति जो भी जीवन में रंग भरे। प्रेम के बीस चेहरों में से वास्तविक को पहचानना हो तो कठिन भी नहीं। वह आवारा नहीं होता। जिम्मेदार और होशमंद होता है। आवारा होता तो खाप के खप्पर से न टकराता। प्रेम तो रास्ता दिखाता है शाश्वतता का। लेकिन प्रेम से भी दिलफरेब होते हैं गम रोजगार के। प्रेम न भटकता है और न भटकाता है, जमीन पर रखता है।
तभी तो फैज अहमद फैज से भी कहलवा गया था :
मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग
और भी गम हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
खो गई है हंसी
जो कहा नहीं गया
जैसे धीरे-धीरे कोई होता है मरणासन्न /
वह कहने से
बचने का नहीं
कहने के लिए समय न होने
का संक्रमणकाल था/
पत्र वैसे ही खत्म हुए
जैसे होते हैं शब्द /
सबसे पहले उड़ा ‘प्रिय’
फिर हाशिये से बाहर हुए ‘आदरणीय’
फिर नाम
और फिर वह गायब हुआ
जो कहना होता था /
यह समय के चाबुक से छिली
संवाद की पीठ थी या
व्यस्तताओं के बटुए से छिटकी भाषा की पर्ची
लेकिन पता यही चला
संवाद नहीं रहा/
खतरनाक आवाज करने वाले
काले चोंगे भी चुक गए
फिर अचानक ही दुनिया आ गई जैसे मुट्ठी में
ऐसा यंत्र जो विभिन्न ध्वनियों में नाम झलका कर
शोर मचा कर बताता था
‘अमुक कॉल कर रहा है’/
संप्रेषण का यह अद्भुत अवतार था
कि जिस दिन लंगड़ाई हुई भाषा में पहला
एसएमएस अवतरित हुआ होगा
उस दिन यकीनन व्याकरण की तेरहवीं रही होगी/
यह किसी ने नहीं देखा
कि संवाद अंगुलियों से फिसल गया/
उसके पास होता है
मौसम का मिजाज
गाड़ी का समय
क्या खाया
क्या पकाया
सब सूचनाएं जरूरी मगर खुश्क हैं
लेकिन
भाषा और अभाषा के बीच
सुपरिचित ध्वनि के साथ
दर्ज होने वाली
कोई मिस्ड कॉल दैवीय होती है/
कि कोई है जिसे कुछ कहना था
कोई है जिसे कुछ सुनना था
जिसके होते हैं
अदृश्य शब्द
अनोखे मायने
अद्भुत व्याख्याएं
Wednesday, March 23, 2011
चुप की दहलीज़ पे ठहरा है कोई सन्नाटा
‘’मैं जानता हूँ तुम परेशान हो वरना ऐसे मौसम में इतनी रात गए यहाँ कभी नही आतीं. क्या परेशानी की वजह मुझे पूछने पड़ेगी बेटा?’’
जाने कितने लम्हे खामोशी की नजर हो जाते हैं, वो बाबा को देखती है. ‘’हाँ मैं परेशान हूँ, बहुत परेशान, मैं जानती हूँ, आप भी परेशान होंगे लेकिन ज़ाहिर नही कर रहे, लेकिन मुझ से बर्दाश्त नही होता, मुझे कुछ भी अच्छा नही लगता. आप जानते हैं, सब कुछ पहले जैसा होते हुए हुए भी पहले जैसा नही रहा.’’ बाबा की आंखों में अभी भी सवाल हैं. वो समझ नही पारहे या समझना ही नही चाहते. बाबा आप खबरें देखते हैं ना, एक अजीब सा माहौल हो गया है, कुछ सरफिरे और बुजदिल लोगों ने दहशत गर्दी की साजिश क्या अंजाम दी, लोगों की नज़रें ही बदल गयीं. कुछ हादसों ने पोशीदा नफरतों से नकाब ही हटा दिए. हम बेगुनाह होकर भी गुनाहगार ठहराए जारहे हैं. बाबा आज हिन्दुसानी मुस्लिम एक खौफ के साए में जीर आहा है. उसे शक की नज़र से देखा जारहा है.
’’ बाबा लब भींज लेते हैं, ‘’ हाँ कुछ बुजदिल लोग अपने नापाक इरादों से मज़हब को बदनाम करने की साजिश रच रहे हैं. ये देश के ही नही सारी कौम के दुश्मन हैं, इंसानियत के दुश्मन हैं.’’
‘’मैं मानती हूँ बाबा कि कुछ लोगों ने ऐसा घिनावना काम किया, लेकिन वो मुजरिम थे, हर मुजरिम जो जुर्म करता है तो सज़ा उसे मिलनी चाहिए, लेकिन सज़ा हमें क्यों मिल रही है? आप जानते हैं, कुछ लोग खुले आम हमारे मज़हब की तौहीन कर रहे हैं. उस मज़हब की जो बिना किसी वजह के इक पत्ता तक तोडे जाने के ख़िलाफ़ है. हमारे बारे में जिसका जो दिल चाहता है, खुले आम बोल रहा है. क्या ये जुर्म नही है? बाबा आज माहौल ये है कि किसी का दुश्मनी में भी किया हुआ एक इशारा एक मुस्लिम नौजवान की सारी जिंदगी तबाह करने के लिए काफ़ी है.
''आपने अखबार में पढ़ा है ना की किस तरह मुंबई में एक मौलाना महमूदुल हसन कासमी जो एक फ्रीडम फाइटर की फैमिली से ताल्लुक रखते हैं , की बेईज्ज़ती की गई. सिर्फ़ शक की बिना पर उन्हें नंगे पैर बगैर टोपी के घसीटते हुए पुलिस थाने ले गई. वो तो जब तलाशी में उनके घर के अलबम से पता चला कि वो कितने इज्ज़तदार शहरी हैं तब पुलिस ने ये धमकी देते हुए उन्हें छोड़ा की वो इस वाकये का किसी से ज़िक्र ना करें. बाद में उनकी बड़े नेताओं से जान पहचान देखते हुए उन से माफ़ी मांगी गई. बाबा जब ऐसे क़द वाले शहरी के साथ ऐसा सुलूक हो सकता है तो सोचिये एक आम मुस्लिम के साथ कैसा सुलूक होता होगा.
अपने ही देश में हमारे साथ गैरों जैसा सुलूक किया जाता है. हम एक साँस भी ले लें तो इल्जामों का पूरा पुलिंदा हमें थमा दिया जाता है.’’
वो बोलती जारही है और बाबा हैरत से उसे देखे जारहे हैं. शायद उन्हें यकीन नही आरहा है.
‘’बेटा..वो जाने क्यों उसे टोक देते हैं.’’ मैं मानता हूँ की हमारे साथ ग़लत हो रहा है लेकिन ये वक्ति बेवकूफियां हैं जो वक्त के साथ ख़त्म हो जायेंगी.’’
‘’ लेकिन क्यों बाबा’’ उसे उन पर गुस्सा आजाता है ‘’हम सब ठीक होने का इंतज़ार क्यों करें? हम किसी को सफाई क्यों दें? ये हमारा देश है, वैसे ही जैसे बाकी लोगों का, वो चाहे चर्चों पर हमले करें,चाहे बेगुनाह ईसाइयों को क़त्ल करें, बिहारियों पर ज़ुल्म करें, बम बनाते हुए पकड़े जाएँ, उन्हें हाथ लगाने की हिम्मत कोई नही करता. सारी दुनिया के सामने मस्जिद को शहीद करने वाले, क़त्ल गारत मचाने वाले, खुले आम इज्ज़तदार बने घूम रहे हैं…आप मुझे बताइए बाबा, उनकी करतूतों की उनकी कौम से सफाई क्यों नही मांगी जाती? उन्हें शक की नज़रों से क्यों नही देखा जाता? हम सच भी बोलें तो गद्दारी का तमगा पहना दिया जाता है, क्यों?
हमारा जुर्म क्या यही है की जब मुल्क का बटवारा हुआ तो हम ने अपना देश नही छोड़ा?
बाबा उसकी आंखों में तड़पता हुआ गुस्सा देखते हैं और जाने क्यों सर झुका लेते हैं.
वो उनके सामने आ खड़ी होती है ‘’ बाबा आप ही कहते थे ना की दुनिया में सब से ज्यादा महफूज़ हिन्दुस्तानी मुस्लिम्स हैं, आज देख लीजिये, एक हादसे ने सारे मायने ही बदल डाले हैं. आज हम अपने ही मुल्क में अकेले हो गए हैं. आज हमें एक ऐसे सरबराह की ज़रूरत है जो हमारे साथ खड़ा हो कर हमें ये अहसास दिला सके कि हम अकेले नही हैं, लेकिन ऐसा कोई नही है, हमें वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करने वाले भी तमाशाई बने बैठे हैं.
आप जानते हैं, आज कालेज में एक्स्ट्रा क्लास लेने से इनकार करने पर एक लड़के ने मुझे कहा कि पता नही मुस्लिम्स लडकियां ख़ुद को इतना ख़ास क्यों समझती हैं.हालांकि उसके ऐसा कहने पर सर ने उसे डांटा भी, मैं कहना तो बहुत कुछ चाहती थी लेकिन आप ने मुझे मना किया था की ऐसे किसी टोपिक पर मैं अपनी ज़बान ना खोलूं, मैंने कोई जवाब तो नही दिया पर मैं उसकी आंखों के बदलते रंग देख कर दंग रह गई. आपको पता है ये वही लड़का था जो जाने कब से मुझ से दोस्ती की ख्वाहिश रखता था. कई बार सख्त लहजे में बात करने के बावजूद कभी उसके नर्म और मीठे लहजे में तब्दीली नही आई थी. आज उसका लहजा उसकी आंखों का अंदाज़ सब बदल गए थे. बाबा ये सब ठीक नही है, लोगों को बदलना होगा, ये हमारा देश है, कोई हमें पराया नही कर सकता. लोगों को समझना होगा की दहशत गर्दी का जन्म ज़ुल्म और बेइंसाफी की कोख से होता है. इसका ताल्लुक ना किसी मज़हब से होता है न किसी कौम से.
ये कुछ बेवकूफ और जज्बाती लोगों का इंतकाम होता है, ठीक उसी तरह जैसे ऊंची जात वालों के ज़ुल्म और तशद्दुद से तंग आकर छोटी जात के कहे जाने वाले कुछ जज्बाती बन्दूक उठा लिया करते थे. उसमें मज़हब का कोई दखल नही होता. बाबा ये बात लोगों को समझनी होगी, मीडिया को समझनी होगी जो तरह तरह की बातें फैला कर लोगों के जज़्बात भड़का रहा है. कुछ गलतियां हम पहले कर चुके हैं, अब और किसी गलती की गुंजाइश नही बची है. ये बात सब को समझनी होगी. हम एक घर में रहने वाले और एक ही फॅमिली का हिस्सा हैं. अगर खुशियों में एक हैं तो गम और मुसीबतों में भी एक होने चाहियें. परिवार तो वाही होता है ना बाबा?
वो थक कर चुप हो गई है, बाबा खामोश भीगे फर्श को तकते हुए जाने क्या सोचे जारहे हैं.
‘’बेटा, मैंने उम्मीद का दमन नही छोड़ा है, ये रमजान का महीना है, ये हमें सब्र की तलकीन करता है, सब्र से बड़ा हथियार कोई नही है.’’ आओ अब अनादर चलें’’
‘’सब्र…वो तल्खी से मुस्कुरा देती है. बाबा के सामने दिल में छाया गुबार निकाल कर मन कुछ हल्का हो गया है.बारिश की बूँदें फिर से गिरना शुरू हो गई हैं. मौसम कुछ और सर्द हो गया है, सन्नाटा भी और गहरा हो गया है. वो आसमान को देखती है. पता नही, उसका वहम है या सच, अँधेरा कुछ और बढ़ता महसूस हो रहा है. वो बाबा का हाथ थामे हुए अन्दर की जानिब बढ़ जाती है.
Monday, March 7, 2011
मैं मर्द हूं, तुम औरत, मैं भूखा हूं, तुम भोजन!!
मैं भेड़िया, गीदड़, कुत्ता जो भी कह लो, हूं. मुझे नोचना अच्छा लगता है. खसोटना अच्छा लगता है. मुझसे तुम्हारा मांसल शरीर बर्दाश्त नहीं होता. तुम्हारे उभरे हुए वक्ष.. देखकर मेरा खून रफ़्तार पकड़ लेता हूं. मैं कुत्ता हूं. तो क्या, अगर तुमने मुझे जनम दिया है. तो क्या, अगर तुम मुझे हर साल राखी बांधती हो. तो क्या, अगर तुम मेरी बेटी हो. तो क्या, अगर तुम मेरी बीबी हो. तुम चाहे जो भी हो मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता. मेरी क्या ग़लती है? घर में बहन की गदरायी जवानी देखता हूं, पर कुछ कर नहीं पाता. तो तुमपर अपनी हवस उतार लेता हूं. घोड़ा घास से दोस्ती करे, तो खायेगा क्या? मुझे तुम पर कोई रहम नहीं आता. कोई तरस नहीं आता. मैं भूखा हूं. या तो प्यार से लुट जाओ, या अपनी ताक़त से मैं लूट लूंगा.
वैसे भी तुम्हारी इतनी हिम्मत कहां कि मेरा प्रतिरोध कर सको. ना मेरे जैसी चौड़ी छाती है ना ही मुझ सी बलिष्ठ भुजायें. नाखून हैं तुम्हारे पास बड़े-बड़े, पर उससे तुम मेरा मुक़ाबला क्या खाक करोगे. उसमें तो तुम्हे नेल-पॉलिश लगाने से फ़ुरसत ही नहीं मिलती. कितने हज़ार सालों से हम मर्द तुम पर सवार होते आये हैं, क्या उखाड़ लिया तुमने हमारा? हर दिन हम तुम्हारी औक़ात बिस्तर पर बताते हैं. तुम चुपचाप लाश बनी अपनी औक़ात पर रोती या उसे ही अपनी किस्मत मान लेटी रहती हो. ताक़त तो दूर की बात है, तुममें तो हिम्मत भी नहीं है. हम तो शेर हैं. जंगल में हमे देख दूसरे जानवर कम से कम भागते तो हैं पर तुम तो हमेशा उपलब्ध हो. भागते भी नहीं. बस तैयार दिखते हो लुटने के लिये. कुछ एक जो भागते भी हो तो हमारे पंजों से नही बच पाते. पजों से बच भी गये तो सपनों से निकलकर कहां जाओगे.
पिछले साल तुम जैसी क़रीब बीस बाईस हज़ार औरतॊं का ब्लाउज़ नोचा हम मर्दों नें. तुम जैसे बीस बाईस हज़ार औरतों का अपहरण किया. अपहरण के बाद मुझे तो नहीं लगता हम कुत्तों, शेरों या गीदड़ों ने तुम्हे छोड़ा होगा. छोड़ना हमारे वश की बात नहीं. तुम्हारा मांस दूर से ही महकता है. कैसे छोड़ दूं. क़रीब अस्सी-पचासी ह़ज़ार तुम जैसी औरतों को घर में पीटा जाता है. हम पति, ससुर तो पीटते हैं ही, साथ में तुम्हारी जैसी एक और औरत को साथ मिला लिया है जिसे सास कहते हैं. और ध्यान रहे ये सरकारी रिपोर्ट है. तुम जैसी लाखों तो अपने तमीज़ और इज्ज़त का रोना रोते हो और एक रिपोर्ट तक फ़ाईल करवाने में तुम्हारी…. फट जाती है. तुम्हारे मां-बाप, भाई भी इज्ज़त की दुहाई देकर तुम्हे चुप करवाते हैं और कहते हैं सहो बेटी सहो. तुम्हारे लिये सही जुमला गढ़ा गया है, “नारी की सहनशक्ति बहुत ज़्यादा होती है.” तो फिर सहो.
मैं मर्द हूं और हज़ारों सालों से देखता आ रहा हूं कि तुम्हारी भीड़ सिर्फ़ एक ही काम के लिये इक्कठा हो सकती है. मंदिर पर सत्संग सुनने के लिये. तो क्या अगर तुम्हारा रामायण तुम्हे पतिव्रता होना सिखाता है. मर्दों के पीछे पीछे चलना सिखाता है. तो क्या, अगर तुम्हारी देवी सीता को अग्नि-परीक्षा देनी पड़ती है. तो क्या अगर तुम्हारी सीता को गर्भावस्था में जंगल छोड़ दिया जाता है. तो क्या अगर तुम्हारा कृष्ण नदी पर नहाती गोपियों के कपड़े चुराकर पेड़ पर छिपकर उनके नंगे बदन का मज़ा लेता है. तो क्या अगर तुम्हारी लक्ष्मी हमेशा विष्णु के चरणों में बैठी रहती है. तो क्या, अगर तुम्हारा ग्रंथ तुम्हारे मासिक-धर्म का रोना रो तुम्हे अपवित्र बता देता है. हम मर्द तुम्हें अक्सर ही रौंदते हैं. चाहे भगवान हो या इंसान, तुम हमेशा पिछलग्गू थे और रहोगे. तो क्या, अगर हरेक साल तुम तीन-चार लाख औरतों को हम तरह तरह से गाजर-मुली की तरह काटते रहते हैं. कभी बिस्तर पर, कभी सड़कों पर, कभी खेतों में. तुम्हारी भीड़ सत्संग के लिये ही जुटेगी पर हम मर्द के खिलाफ़ कभी नहीं जुट सकती.
तुम्हे शोषित किया जाता है क्युंकि तुम उसी लायक हो. मर्दों की पिछलग्गू हो. भले ही हमें जनमाती हो, पर तुम बलात्कार के लायक ही हो. तुम्हारी तमीज़ तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन और हमारा हितैषी है. जब तक इस तमीज़ को अपने दुपट्टे में बांध कर रखोगे, तब तक तुम्हारे दुपट्टे हम नोचते रहेंगे. जब तक लाज को करेजे में बसा कर रखोगे तब तक तुम्हारी धज्जियां उड़ेंगी. मैं भूखा हूं, तुम भोजन हो. तुम्हे खाकर पेट नहीं भरता, प्यास और बढ़ जाती है.
Wednesday, February 16, 2011
Sunday, February 13, 2011
Saturday, February 12, 2011
महिला के शासन में महिलाओं पर बढ़ रहे अत्याचार: अमर सिंह
महिला के शासन में महिलाओं पर बढ़ रहे अत्याचार: अमर सिंह
फतेहपुर की बलात्कार के असफल प्रयास में घायल लड़की को देखने हैलट अस्पताल आये अमर सिंह ने पीड़ित परिवार को एक लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी. इसके अलावा कुछ दिनो पहले बलात्कार का शिकार होकर मरी बालिका कविता के परिजनों को भी एक लाख रुपये की सहायता दी.
उन्होंने संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि केवल कानपुर ही नही प्रदेश के अनेक शहरों मेरठ, गाजियाबाद आदि में भी महिलाओं और लड़कियों के साथ अत्याचार बढ़े है और इनमें दलितों के साथ अन्य समाज की महिलायें भी शामिल है.
फोन टैपिंग मामले के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि मैं पहले भी इस मामले में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का नाम लिये जाने के लिये माफी मांग चुका हूं और फिर माफी मांग रहा हूं और अपने शब्द वापस ले रहा हूं. यह पूछे जाने पर कि क्या वह कांग्रेस पार्टी में शामिल हो रहे है, उन्होंने कहा कि वह तो नही शामिल हो रहे है लेकिन इस बारे में समाजवादी पार्टी से जरूर पूछ लीजियें शायद वह इसका बेहतर जवाब दे सकें.
सिंह ने कहा कि समाजवादी पार्टी उन पर आरोप लगाती है कि वह पूर्वाचंल की यात्रा एसी गाड़ियों में बैठकर करते है, इस पर उन्होंने अपने पैर दिखाते हुये कहा कि मेरे पैरों की हालत देखकर आपको लग सकता है कि मैं पैदल यात्रा कर रहा हूं या एसी गाड़ी से.
Thursday, February 3, 2011
हम लोगों ने निर्गुण- निराकार शब्दों को हाउ बना डाला है -दिनेस पारीक
निर् + गुण और निर् + आकार आदि समस्त पद है। व्याकरण शास्त्र के आचार्यो ने ऐसा नियम बताया है की ------ निर् आदि अव्यवों का पंचमी विभ्क्त्यंती शब्दों के साथ क्रांत (अतिक्रमण) आदि अर्थों में समास होता है।
इनका विग्रह (विश्लेषण) इस प्रकार किया जाता है------- निर्गतो गुणेभ्यो यः स निर्गुणः, निर्गत आकारेभ्यो यः स निराकारः । मतलब जो सारे गुणों का अतिक्रमण कर जाये (प्रकृति के सत्व, रज, तम तीनो गुणों से लिप्त ना हो ) वही निर्गुण कहलाता है। इसी तरह पृथ्वी आदि समस्त आकारों को जो अतिक्रमण करने की सामर्थ्य रखता हो, अर्थात जिसका आकार अखिल ब्रह्माण्ड से भी बड़ा हो, वही निराकार कहलाता है। निर्विशेष, निर्विकल्प आदि दूसरे शब्दों का भी इसी तरह अर्थ होता है।
व्याकरण शास्त्र के इन शब्दों के उपर्युक्त अर्थ के समर्थक उदहारण भी है। जैसे-------- "निस्त्रिंश:निर्गत: त्रिन्शेम्योsगुलिभ्यो यः स निस्त्रिंश:" अर्थात तीस अंगुल से बड़े खड्ग (तलवार) को निस्त्रिंश कहना चहिये।
इसी तरह वेदादि शास्त्रों में भी परमात्मा का आकार भी समस्त आकारों से बड़ा बताया गया है जिसके एक एक रोम में करोड़ों ब्रह्माण्ड स्थित है।
"ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।"
"पगु बिन चलै, सुनै बिन काना....कर बिन करम करै बिधि नाना"!! का अर्थ भी इन्ही अर्थों में है.................
शास्त्रीय प्रमाणों से जब अर्थ का सामंजस्य हो जाता है, फिर ब्रह्म को सर्वथा गुण रहित और आकार रहित कैसे माना जाये ????
Tuesday, December 28, 2010
मैं तो ग़ज़ल सुना के अकेला खड़ा रहा सब अपने अपने चाहने वालों में खो गए
सब अपने अपने चाहने वालों में खो गए
हश्र औरों का समझ कर जो संभल जाते हैं
वो ही तूफ़ानों से बचते हैं, निकल जाते हैं
मैं जो हँसती हूँ तो ये सोचने लगते हैं सभी
ख़्वाब किस-किस के हक़ीक़त में बदल जाते हैं
ज़िंदगी, मौत, जुदाई और मिलन एक जगह
एक ही रात में कितने दिए जल जाते हैं
आदत अब हो गई तन्हाई में जीने की मुझे
उनके आने की ख़बर से भी दहल जाते हैं
हमको ज़ख़्मों की नुमाइश का कोई शौक नहीं
कैसे ग़ज़लों में मगर आप ही ढल जाते हैं
Tuesday, December 14, 2010
वो सुनता तो मैं कहता, कुछ और कहना था,
Friday, December 3, 2010
Hindi Comedy Hasya kavita : कभी हिम्मत ना हारना
मै जब जब लडखडाकर गिरता
मेरा खडे होकर फिरसे दौडना ना छूटता
क्योंकी...
मेरे पिछे पड गया था एक पागल कुत्ता
Thursday, November 25, 2010
याद की बरसातों में’
लगे जुगनू से चमकते हैं सियाह रातों में
चैन पाया है तेरी याद की बरसातों में
खो ना जाना कहीं जज़्बात की बारातों में
सच ओ ईमान को पाओगे हवालातों में
जो जिया करता है बिगड़े हुए हालातों में
सारे मौजूद जब अपने ही रिश्ते नातों में
फिर तो दोहराव है बाकी की मुलाक़ातों में
जिसको देखूँ वो है मशगूल बही खातों में
‘याद बहुत आता है
यादों ने आज’
दिल का कुसूर था मगर आँखों ने रो दिया
लेकिन मेरा नसीब कि उसको भी खो दिया
मन में जमी जो मैल थी उसको भी धो दिया
खुशबू ने मेरे पाँव में काँटा चुभो दिया
लेकिन समय की मार ने मुझको डुबो दिया
मुझको सुकून है मगर लोगों ने रो दिया
ये ख़ास दिन
प्यार की बातें करो
कुछ तुम कहो कुछ वो कहें,
इज़हार की बातें करो
इक गीत-सा गाने लगें
आँखों में आँखें डाल कर
इक़रार की बातें करो
लाए हो वो रख दो कहीं
बाहें गले में डाल कर,
इस हार की बातें करो
ने बदल दी ज़िंदगी
उस गुलबदन के होंट औ
रुखसार की बातें करो
ये प्यार का दस्तूर है
राहे-मुहब्बत में वफ़ा-ए-
यार की बातें करो
मुद्दत के बाद
मेरी वफ़ा की आँच में पत्थर पिघल गया
जैसे अमा की रात में चंदा निकल गया
मन भी मचल गया मेरा तन भी मचल गया
यादों में रात ढल गई सूरज निकल गया
उसका तसव्वुर ही मेरे शेरों में ढल गया
मेरे लिए’
हीरे जैसा कीमती पत्थर है वो मेरे लिए
प्यार के पैग़ाम का मंज़र है वो मेरे लिए
चाहतों का खूबसूरत घर है वो मेरे लिए
इस अंधेरी रात में रहबर है वो मेरे लिए
चिलचिलाती धूप में तरुवर है वो मेरे लिए
ज़िंदगी भर की दुआ का दर है वो मेरे लिए
मुद्दत के बाद
ये डीग्री भी लेलो, ये नौकरी भी लेलो,
भले छीन लो मुझसे USA का विसा
मगर मुझको लौटा दो वो क्वालेज का कन्टीन,
वो चाय का पानी, वो तीखा समोसा……….
वो प्रोजेक्ट की खातीर शहर भर भटकना,
वो लेक्चर मे दोस्तों की प्रोक्झी लगाना,
वो सर को चीढाना ,वो एरोप्लेन उडाना,
वो सबमीशन की रातों को जागना जगाना,
वो ओरल्स की कहानी, वो प्रक्टीकल का किस्सा…..
बीमारी का कारण दे के टाईम बढाना,
वो सेमीनार के दिन पैरो का छटपटाना,
वो WorkShop मे दिन रात पसीना बहाना,
पर वो मा का विश्वास – टीचर का भरोसा…..
वो पेडो के नीचे गप्पे लडाना,
वो रातों मे Assignments Sheets बनाना,
वो भोले से फ़्रेशर्स को हमेशा सताना,
Without any reason, Common Off पे जाना,
टेस्ट के वक्त Table me मे किताबों को रखना,
भले छीन लो मुझसे USA का विसा
मगर मुझको लौटा दो वो क्वालेज का कन्टीन
ये दुनिया.
कि अब इंसानियत ग़ाफ़िल हुई है
फ़ज़ा तारों तलक क़ातिल हुई है
लहर जिस पाप की साहिल हुई है
जिन्हें दौलत नहीं हासिल हुई है
वहाँ गुर्बत की ही महफ़िल हुई है
लहू से ♥ पे
तू ही बता मैं तुझको अपने ♥ से कैसे भुलादु !!
मेरे हस्ती का जो हशी है उसे कैसे भुला दु !!
सब से फुरसत का जो हशी है उसे कैसे भुलादु !!
उस दोस्त को पाकर उसे कैसे भुला दु !!
जो याद रहेगी सदा उसे कैसे भुला दु !!
मुझे पिला के
मेरे नसीब को आकर जगा गया कोई
मेरी निगाह में लेकिन समा गया कोई
दर-ओ-दीवार को दुश्मन बना गया कोई
मेरे हिसाब को आकर मिटा गया कोई
ज़रा-सी बात पर मुझको रुला गया कोई
किसी मज़ार पर चादर चढ़ा गया कोई
वो जाने कहाँ हैं
सामने गुलाब है पर वो जाने कहाँ हैं
है जिनके पास वो जाने कहाँ हैं
मैं ढूँढूँ उन्हें पर वो जाने कहाँ हैं
हम जिनमें खोये वो जाने कहाँ हैं
दूर तक निगाह में. . .
मगर जो हैं माली वो जाने कहाँ हैं
जो हैं डाकिए वो जाने कहाँ हैं
मेरा हमसफर तो न जाने कहाँ हैं
बड़ी मुश्किल सी कोई’
अगर इंसानी फ़ितरत की हमें पहचान होती है
ग़मों से लड़ के ही तो ज़िंदगी आसान होती है
ये जो हो हाथ में शैतान के, शैतान होती है
यहाँ तक एक भी नेकी कभी ताबान होती है
मुसलसल रौशनी भी दर्द का सामान होती है।
वो मेरा ही काम करेंगे
जब मुझको बदनाम करेंगे
मेरे क़िस्से आम करेंगे
वो होगा जो राम करेंगे
हाक़िम अपना नाम करेंगे
दूने अपने दाम करेंगे
मेरी नींद हराम करेंगे
मेरे हवाले जाम करेंगे
यूँ हम उम्र तमाम करेंगे
कोई अच्छा काम करेंगे
खुदको फिर बदनाम करेंगे !!
पहचान
ढूँढ़ता हूँ दर-ब-दर मिलता नहीं इन्सान है।।
दर्द एक दूजे का बाँटें तो यही एहसान है।।
जिंदगी, उनको जगाना हक से भी अनजान है।।
दीख रहा, वो व्यावसायिक झूठी सी मुस्कान है।।
ताज काँटों का न छूटे बस यही अरमान है।।
साथ तुम्हारा कितना
कितने हाथ हमारे होते
बिल्कुल पास हमारे होते
कितने जुर्म हमारे होते
ऐसे न बँटवारे होते
कितने ख़्वाब सुनहरे होते
नैना ये कजरारे होते
तुम भी अपने प्यारे होते
ऐसे न चटखारे होते
दुखी खूब हरकारे होते
कैसे नोट डकारे होते
हम तुम्हारे अब भी
हम तुम्हारे तब भी थे, हम तुम्हारे अब भी हैं
हम तो रूठे तब ही थे, आप तो रूठे अब भी हैं
तब तो पास होके दूर थे, और दूरियाँ अब भी हैं
प्यासे हम तब भी थे, प्यासे हम अब भी हैं
सुकून से हम तब भी थे, सुकून से हम अब भी हैं
डरते हम तब भी थे, डरते हम अब भी हैं
कम में गुज़ारा तब भी था, कम में गुज़ारते अब भी हैं
ज़ख्मी हम तब भी थे, ज़ख्मी हम अब भी हैं
मासूम हम तब भी थे, मासूम हम अब भी हैं
फ़रियादी हम तब भी थे, फ़रियादी हम अब भी हैं
बेखब़र हम तब भी थे, बेखब़र हम अब भी हैं
नहीं करना’
नदिया- नदिया’
पनघट- पनघट, गागर- गागर
मेरी प्यास भटकती दर- दर
भीतर है अपनी कस्तूरी
संगम- संगम, तीरथ- तीरथ
मन्दिर- मन्दिर, देव- देव घर
मेरी आस भटकती दर- दर
युगों- युगों की यही कहानी
उपवन- उपवन, चन्दन- चन्दन
सावन- सावन ,जलधर- जलधर
मेरी सांस भटकती दर- दर
धरा- गगन जैसा संगम है
संत- संत पर, पंथ- पंथ पर
मरघट- मरघट, सुधा कुंड पर
मेरी लाश भटकती दर- दर
सोचते ही सोचते
इंसान की मुस्कान क्यों आधी-अधूरी हो गई।।
नफरत के उपवन सिंच रहे और नागफनियॉं खिल रहीं।।
इंसान से इंसान की अब क्यों है दूरी हो गई।
यह सेचते ही सोचते
हो रहीं गमगीन संध्यायें सिसकती भोर हैं।।
वह सुहागिन मॉंग क्यों कर बिन सिंदूरी हो गई।।
यह सोचते ही सोचते
यह देख कर मॉं भारती के हो रहे गीले नयन।।
प्रेम की क्यों भावना भी विष धतूरी हो गई।।
न जानूँ कि कौन हूँ मैं
लोग कहते हैं सबसे जुदा हूँ मैं
मैंने तो प्यार सबसे किया
पर न जाने कितनों ने धोखा दिया।
जिनको बहुत प्यार दिया,
पर कुछ लोग समझ ना सके,
फिर भी मैंने सबसे प्यार किया।
तेरे गम से हम दुखी है,
तुम हँसो तो खुश हो जाऊँगा।
तेरी आँखों में आँसू हो तो मनाऊँगा।
पर अकेले है हम, अकेले है,
फिर भी चलता रहूँगा
मंज़िल को पाकर रहूँगा।
पर मैं न बदलूँगा,
जो बदल गए वो दोस्त थे मेरे
पर कोई न पास है मेरे।
कोई न कोई तो होगी कहीं न कहीं
शायद तुम से अच्छी या
कोई नहीं इस दुनिया में तुम्हारे जैसी।
ज़मीन पर चलना नहीं, मुझे जाना वहाँ है,
पता है गिरकर टूट जाऊँगा, फिर उठने का विश्वास है
मैं अलग बनकर दिखाऊँगा।
न जाने ख़त्म हो जाएँ, किस पल कहाँ,
फिर भी तुम सब के दिलों में ज़िंदा रहूँगा,
यादों में सब की, याद आता रहूँगा।
हम तेरे हो गए
तुमने मुसकुरा कर देखा, हम तेरे हो गए
तुम्हें पा लिया, और खुद तेरे हो गए
इस सोच में डूबे-डूबे, दुबले हो गए
तसव्वुर किया तुम्हारा, और कवि हो गए
ख़यालों में तुम आते रहे, हमनशीं हो गए
रहनुमा बन गए, खुद राज़ हो गए
फिर फूल का क्या करूँ, खुद फूल हो गए
पर तुम्हीं ख़यालों में, इक हँसी गुलाब हो गए
याद मैं करता नहीं, फिर भी याद आ गए
ख़्वाहिश में तुम्हारी, हम लाचार हो गए
एक पल बीता, ऐसा लगे, कई साल हो गए
दोस्त का प्यार चाहिए’
दिल मे मेरे, बसने वाला किसी दोस्त का प्यार चाहिए,
मुसीबत मे किसी एक प्यारे साथी का हाथों मे हाथ चाहिए,
दिल मे उस के, अपने लिए ऐसे जज़्बात चाहिए,
और हमारे उन आँसुओं को पोंछने वाला उसी का रूमाल चाहिए,
बस साहिल पर इन्तज़ार करता हुआ एक सच्चा दिलदार चाहिए,
इस भँवर से पार उतारने के लिए किसी के नाम की पतवार चाहिए,
मुझे भी इस लम्बे रास्ते पर एक अदद हमसफर चाहिए,
पर कोई, जो कहे सच्चे मन से अपना दोस्त, ऐसा एक दोस्त चाहिए,
दोस्त का प्यार चाहिए’
दिल मे मेरे, बसने वाला किसी दोस्त का प्यार चाहिए,
मुसीबत मे किसी एक प्यारे साथी का हाथों मे हाथ चाहिए,
दिल मे उस के, अपने लिए ऐसे जज़्बात चाहिए,
और हमारे उन आँसुओं को पोंछने वाला उसी का रूमाल चाहिए,
बस साहिल पर इन्तज़ार करता हुआ एक सच्चा दिलदार चाहिए,
इस भँवर से पार उतारने के लिए किसी के नाम की पतवार चाहिए,
मुझे भी इस लम्बे रास्ते पर एक अदद हमसफर चाहिए,
पर कोई, जो कहे सच्चे मन से अपना दोस्त, ऐसा एक दोस्त चाहिए,
हम तेरे हो गए
तुमने मुसकुरा कर देखा, हम तेरे हो गए
तुम्हें पा लिया, और खुद तेरे हो गए
इस सोच में डूबे-डूबे, दुबले हो गए
तसव्वुर किया तुम्हारा, और कवि हो गए
ख़यालों में तुम आते रहे, हमनशीं हो गए
रहनुमा बन गए, खुद राज़ हो गए
फिर फूल का क्या करूँ, खुद फूल हो गए
पर तुम्हीं ख़यालों में, इक हँसी गुलाब हो गए
याद मैं करता नहीं, फिर भी याद आ गए
ख़्वाहिश में तुम्हारी, हम लाचार हो गए
एक पल बीता, ऐसा लगे, कई साल हो गए
दिल में गुबार
यार वो बादाख़्वार रहते हैं
लोग उनके शिकार रहते हैं
अब तो वो भी बेकार रहते हैं
जो ज़हन से बीमार रहते हैं
वहाँ खुदगर्ज़ यार रहतै हैं
हुस्न के तल्बगार रहते हैं
ऐश में गिरिफ़्तार रहते हैं
दिल की सदा
गुनगुनाने के लिए सबको सुनाने के लिए
दिल मचलता है तभी कुछ दर्द गाने के लिए
बेसुरे शब्दों के पत्थर आज़माने के लिए
प्यार का पैग़ाम हो मरहम लगाने के लिए
हुस्न ढलता है सुरों में गुनगुनाने के लिए
गीत लिखना चाहिए दिल से सुनाने के लिए
तेरा हँसना’
हमको तुमपर मलाल था साथी
हमने समझा गुलाल था साथी
दिन में तेरा ख्याल था साथी
तेरा कैसा सवाल था साथी
कोई आया दलाल था साथी
जो पत्थर
उसी पत्थर को पूजा है किसी भगवान की तरह
उसे महसूस करता हूँ किसी अहसान की तरह
उसी से बात करता हूँ किसी इनसान की तरह
तुम्हारी याद आती है किसी तूफ़ान की तरह
भूल जाना नहीं मुझे किसी अंजान की तरह
जीवन
सुख दुख का भंवर है,
लोग अलग परिभाषा अलग है।
वेश अलग अभिलाषा अलग है।
तो कोई जीवित है नव के लिये,
तो कहीं है जीत का जज़्बा,
तो कहीं किया कुकर्मों ने कब्ज़ा।
सूर्य का प्रकाश ढूँढ रहा,
मन के सपनों को रूँध रहा।
झुलसे मन में इच्छा पलते,
ढूँढे वह तिनके का सहारा,
बिखरे जैसे बुझती हुई ज्योति।
माँगे प्रभु की असीम कृपा है,
मन में यह विश्वास जगा है।
जितना जीवन मिले वो कम है,
न झुके कभी, ताने रहे सीना,
जाना ब्रह्माण्ड का संक्षिप्त स्वयं है।
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